हेलो नमस्कार दोस्तों आपको इस लेख में देसी रियासतों के विलय के संबंध में पढ़ने को मिलेगा तो चलिए आगे बढ़ते हैं.
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भारत में देशी रियासतों का विलय |
देशी रियासतों के संबंध में - भारत देश की सरकार इस बात के लिए तैयार नहीं थी कि, देशी रियासत भारत की सीमा के अंदर अपनी अलग पहचान बनाए रखें. भारत के दिग्गज नेताओं के सामने सबसे बड़ी व महत्वपूर्ण चुनौती यह थी की इन देसी रियासतों को किस तरह भारत देश में मिलाया जाए.
भारत सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए आदरणीय सरदार वल्लभभाई पटेल जी की अध्यक्षता में एक राज्य विभाग कि स्थापना की.
भारत की रियासतों के भारत में विलय के संबंध में तीन बातें-
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भारत में देशी रियासतों का विलय |
1- देसी रियासतों के भारत में विलय के संबंध में भारत सरकार का रुख लचीला था. भारत सरकार ने देशी रियासतों को यह वादा प्रॉमिस दिया कि भारत देश में उनके मिलने से उनके अधिकारों को कोई खतरा नहीं है. " राज्य विभाग " द्वारा देशी रियासतों के मिलने के लिए एक " मिलन पत्र " तैयार किया गया था. इस मिलन पत्र में यह प्रावधान किया गया था कि देसी रियासतों-
1-रक्षा
2-विदेश मामले
3-संचार के साधन
यह तीनों भारत सरकार को सुपुर्द कर देगी. अन्य मामलों में देशी रियासतों की स्वायत्तता और आजादी बनी रहेगी.
2- दूसरे पॉइंट में यह कहा गया है कि जिन देसी रियासतों की सीमाएँ भारत देश की सीमाओं से मिलती थी. उनके शासकों व राजाओं को यह समझाने का प्रयास किया गया कि वे पाकिस्तान देश में मिल जाने या स्वतंत्र बने रहने की बात ना करें और ना ही ऐसा सोचे.
सरदार वल्लभभाई पटेल जी ने इन शासकों व राजाओं को
" राष्ट्रीय एकता अखंडता " का बोध कराया और यह विश्वास दिलाया कि वे दिल से देसी रियासतों का और इस भारत देश का भला चाहते हैं.
3- तीसरे लेख में यह कहा गया है कि, भारत सरकार के पास इस बात के पूर्ण रूप से जानकारी थी कि अधिकतर रजवाड़ों के लोग शासकों व राजाओं से परेशान थे और लोकतांत्रिक भारत देश में शामिल होना चाहते थे.
रियासतों का भारत संघ में विलय
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भारत में देशी रियासतों का विलय |
आपने ऊपर पढ़ा कि देशी रियासतों के विलय के संबंध में भारत का नजरिया- और अब आप पढ़ेंगे देशी रियासतों का भारतीय संघ में विलय.
महत्वपूर्ण- जम्मू कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद को छोड़कर बचे सभी रजवाड़ों के राजा व शासक 15 अगस्त 1947 भारत देश के आजादी से पहले ही भारत में मिलने से मिलने के लिए मान गए थे. मणिपुर के राजा ने भी मिलन पत्र पर अपने हस्ताक्षर कर दिए थे, बाद में यह मामला कुछ उलझ गया था. इस समस्या का समाधान कर लिया गया था.
सरदार वल्लभ भाई पटेल जी और उनके सुयोग्य सचिव वी• पी• मैनन ना होते तो देशी रियासत अपना अलग देश बना लेते या पाकिस्तान में मिल जाते.
Point--
• सरदार वल्लभभाई पटेल जी की चतुराई और कूटनीति ने भारत को अनेक टुकड़ों को बट जाने से बचा लिया.
• भारत की देसी रियासतों के विलय में सरदार वल्लभभाई पटेल और वी• पी• मेनन जी के महत्वपूर्ण भूमिका रही.
• आजादी के बाद लगभग 562 देशी रियासतों में से 559 देशी रियासतों का भारत देश में विलय हो गया और अन्य तीन देशी रियासतों
1- हैदराबाद ( पोलो ऑपरेशन )
2- जूनागढ़ ( जनमत संग्रह )
3- जम्मू कश्मीर को ( विलय अधिपत्र ) के माध्यम से भारत में शामिल किया गया.
जूनागढ़ का विलय कैसे हुआ-
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भारत में देशी रियासतों का विलय |
गुजरात के दक्षिण पश्चिमी छोर पर स्थित ' जूनागढ़ ' राज्य था. जूनागढ़ रियासत में मानाबदार मंगरोल और बाबरियावाड़ नामक जागीरें शामिल थी. जूनागढ़ और पाकिस्तान के बीच में अरब सागर था और यहां 80% जनसंख्या हिंदू थे. मुस्लिम लीग के जाने-माने सदस्य की सलाट पर जूनागढ़ के नवाब " महाबत खान " पाकिस्तान के साथ सम्मिलित हो गए.
पाकिस्तान के आजाद होने के बाद 15 अगस्त, 1947 को शामिल होने की घोषणा की.
पाकिस्तान ने जूनागढ़ की सम्मिलन की स्वीकृति सितंबर महीने में दी, भारत को पता लगते ही भारत को आघात पहुंचा. मोहम्मद अली जिन्ना यह जानते हुए भी कि हिंदू और मुसलमान एक राष्ट्र के रूप में नहीं रह सकते फिर भी जिन्ना ने जूनागढ़ को विलय का अनुमोदन कैसे किया.
सरदार वल्लभ भाई पटेल जी ने पाकिस्तान को सम्मिलन रद्द करने तथा जूनागढ़ में जनमत संग्रह कराने के लिए समय दिया. क्योंकि जूनागढ़ में 80% जनसंख्या हिंदू थे.
सरदार वल्लभभाई पटेल (गृह मंत्री) जी ने जूनागढ़ की तीन जागीरों पर बलपूर्वक कब्जा करने का आदेश दिया. जूनागढ़ का दरबार जो पहले से ही आर्थिक तंगी से हार का सामना कर रहा था, ऐसे में भारतीय सेना का सामना कैसे करते. इन सब को देखते दिसंबर महिने में जनमत संग्रह कराया गया.
इस जनमत संग्रह में 99% लोगों ने पाकिस्तान में ना जाकर भारत में शामिल होने के लिए कहा.
हैदराबाद का विलय कैसे हुआ-
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भारत में देशी रियासतों का विलय |
भारत की सबसे बड़ी रियासत हैदराबाद थी.
भारत के केंद्र में हैदराबाद नामक विशाल राज्य स्थित था. हैदराबाद की जनसंख्या 1 करोड़ 40 लाख थी, जिसमें 85% हिंदू थे.
हैदराबाद का राजा व शासक नरेश निजाम उसमान अली खान था.
शासक नरेश निजाम उसमान अली खान का ब्रिटिश राज्य के साथ सदैव संबंध रहा.
हैदराबाद भारत की एकता और अखंडता के लिए बहुत महत्वपूर्ण था.
सरदार वल्लभभाई पटेल जी को यह आत्मविश्वास था कि हैदराबाद सहयोग के लिए पाकिस्तान पर डिपेंड है और भविष्य में यह सदैव भारत की सुरक्षा के लिए एक खतरा बना रहेगा.
सरदार वल्लभ भाई पटेल जी को यह यह भी विश्वास था कि भारत की एकता और अखंडता के लिए भारत के साथ हैदराबाद का होना अति आवश्यक है.
सरदार वल्लभभाई पटेल, लॉर्ड माउंटबेटन की इस बात से सहमत थे कि शक्ति का तुरंत प्रयोग न किया जाए. ' निष्कर्ष शांत समझौते ' पर हस्ताक्षर किए गए, क्योंकि लड़ाई झगड़ा करने से कोई फायदा नही.
सरदार पटेल जी यह चाहते थे कि हैदराबाद यह वादा अवश्य दें कि पाकिस्तान के साथ कभी भी सम्मिलित नहीं होगा.
लॉर्ड माउंटबेटन तथा भारत की एजेंट के एम मुंशी जी ने हैदराबाद के शासक के दूत के साथ बातचीत की दोनों के वार्तालाप में कोई बात नहीं बनी और निजाम ने भारत पर अवरोध उत्पन्न करने का आरोप लगाया.
भारत ने निजाम पर यह आरोप लगाया कि हैदराबाद पाकिस्तान से हथियार ले रहा है. निजाम रजवी के रजाकर लड़ाकुओं के हिंदुओं को डराने और भारत के गांव पर प्रहार करने की छूट दे रहा है.
निजाम से यह उम्मीद लगाई गई कि वह " जनमत - संग्रह " और संवैधानिक सभा के लिए निर्वाचन करवाएं और आखिरकार निजाम को भारत में सम्मिलित होना था.
सितंबर, 1948 में मंत्रिमंडल की बैठक में पटेल में निजाम के विरुद्ध शक्ति प्रयोग करने की अपनी इच्छा प्रकट की.
भारत के नए गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी तथा प्रधानमंत्री नेहरू की स्वीकृति सरदार पटेल ने ले ली और उसके बाद " ऑपरेशन पोलो " के अधीन हैदराबाद पर आक्रमण करने के लिए सेना भेजी.
13 सितंबर से 18 सितंबर तक भारतीय फौज ने हैदराबादी फौजी तथा रजाकारो के विरोध युद्ध किया और उन्हें हराया.
लॉर्ड माउंटबेटन तथा नेहरू द्वारा कूटनीति द्वारा एकीकरण उत्पन्न करने का मुख्य उद्देश्य हिंदुओं तथा मुसलमानों के मध्य हिंसा के प्रारंभ से बचना था.